22 October 2015

बच्चों की शिक्षा के लिए बैजनाथ की तरफ बढ़ते रुख के कारण खत्म हो रहा है हमारा लडभड़ोल

लडभड़ोल: लगता है लडभड़ोल तहसील और पलायन का साथ चोली दामन का होने वाला है। लडभड़ोल को तहसील बने 20 साल हो गए है। लेकिन हकीकत में लडभड़ोल के विकास की धीमी रफ्तार के कारण बैजनाथ या पालमपुर में मिल रही बेहतर शिक्षा की दरकार हमें वहां रुख (पलायन) करने को मजबूर कर रही है। लडभड़ोल तहसील के लगभग सभी गाँव से पलायन लगातार बढ़ रहा है। यहाँ खेत बंजर हो रहे है, गांव के घरो में सिर्फ बजुर्ग रह रहे। संस्कृति पर खतरा मंडरा रहा है और एक गौरवमयी समाज खात्मे की तरफ बढ़ रहा है।

लडभड़ोल के युवा वर्ग पर नजर डालें तो मानो उन पर पलायन के पंख ही लग गए हों। और यह सही भी है| लडभड़ोल के गाँवों का आंकलन करें तो यहां पर शिक्षा और सेना दो ऐसे क्षेत्र है जो सबसे ज्यादा रोजगार प्रदान करते हैं। जैसे ही युवा 18 साल की दहलीज पार करता है तो वह सेना क्षेत्र में सबसे पहले अपना भाग्य आजमाता है या किसी दूसरे राज्य में जाकर शिक्षा ग्रहण करता है। सेना में भर्ती होने के बाद या सरकारी या प्राइवेट नोकरी मिलने के शादी होने में देर नही लगती| शादी होने के बाद उसका सबसे पहला काम गांव छोड़कर शहर में बसना ही है। अगर देखा जाये तो बैजनाथ और पालमपुर लडभड़ोल के लोगों की वजह से ही विकसित हो रहे है। वहां किसी भी अन्य क्षेत्र के मुकाबले लडभड़ोल के लोग अधिक संख्या में रहते है।

दुनिया की चकाचैंध से कदमताल भरने को अमादा कुछ युवाओं से मैंने जब पलायन के संबंध में बात की तो उनका साफ कहना था कि यहां क्यों रहें हम ? हमारी प्रतिभा के हिसाब से लडभड़ोल में हमारे लायक सुविधाएं नही है| हमे कहीं न कहीं लग रहा था की वो शायद बिलकुल सही कह रहे थे। उन्हें लगता है कि बेहतरीन शिक्षा शहरों के प्राइवेट स्कूलों में है। गांव के सरकारी स्कूल तो बस नाम के हैं। हालांकि सरकार द्वारा बच्चों के शिक्षा स्तर को उठाने के लिए बेहतरीन प्रयास किए जा रहे हैं परन्तु बीच में ये प्रयास कहां गुम होकर रह जाते हैं पता नहीं चलता।

हर पिता की ये ख्वाहिश होती है कि वो अपने बेटे को अच्छी शिक्षा दिलाए ताकि वो बङा होकर कुछ बने और परिवार का नाम रोशन करे। लडभड़ोल के लोगो की यही ख्वाहिश उन्हें गाँव छोड़कर बैजनाथ या पालमपुर जैसे शहरो में पलायन करने को मजबूर कर रही है| इस पलायन की बढ़ी वजह लडभड़ोल तहसील के गांवों में अच्छी शिक्षा व्यवस्था और अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं का आभाव है। इसलिए बच्चों के भविष्य के लिए माता-पिता को लडभड़ोल से पलायन करना एक बिलकुल सही कदम है। अगर यह सही कदम है तो फिर इस तरह की स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है, माँ-बाप, बेटा या आधुनिक संस्कृति या सरकार ?

कुछ लोग इस विषय पर असमंजस में नजर आते हैं कि बच्चों के अच्छी शिक्षा कौन सी होनी चाहिए। कुछ लोगों के लिए अच्छी शिक्षा का मतलब उसके बदले ली जा रही फीस से है जबकि कुछ के लिए भाषा माध्यम है जैसे-हिन्दी, अँग्रेजी या स्थानीय भाषा। ज्यादातर लोग महँगी शिक्षा और अँग्रेजी माध्यम को ही अच्छी शिक्षा समझते हैं। चूँकि आधुनिक दौर प्रतियोगिता का दौर है इसलिए माता-पिता अपनो बच्चों को गुणात्मक शिक्षा ना दिलवाकर तथाकथित महँगी और अँग्रेजी शिक्षा दिलवाते हैं। अँग्रेजी और महँगी शिक्षा में बच्चों के मानसिक विकास की बजाय उसके परीक्षा में प्राप्त अंकों के आधार पर मूल्यांकन होता है जिसमें बच्चे रट्टा मारकर या नकल मारकर भी अच्छे नम्बर ला सकते हैं। ऐसी संस्थाओं में बच्चों को संस्कार या मिट्टी का मोल नहीं बताया जाता बल्कि भौतिकतावादी संस्कृति को कैसे बढाया जा सकता है ये सिखाया जाता है।

प्रकृति ने दिल खोलकर लडभड़ोल को निशुल्क उपहार दिये हैं लेकिन इनका समुचित उपयोग नहीं होने से हमारा लडभड़ोल पिछड़ा हुआहै। जिस तहसील में ब्यास और बिनवा बहती हों फिर भी वहां के लोग पानी के लिए तरसते हो तो कल्पना करिए इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है़।

अतीत बड़ा सुखदाई होता है, और कई मामलों में सुविधाजनक भी| खासकर शहर में अपने गाँव से दूर रहकर, बीते समय और पहाड़ के अपने गाँव को याद करना कई बार बड़ा सुखद अनुभव देता है| सुखदाई इस परिप्रेक्ष में कि अतीत की गलियों में जिम्मेदारी से भेंट नहीं होती| हम अपने गाँव से दूर रहकर उसके अतीत में तो जीते हैं, पर वर्तमान में उसे तिल तिल कर मरने के लिए छोड़ आये हैं। जिंदगी की दौड ने हमें गाँवों से जुदा कर दिया है|

लडभड़ोल के संबंध में तो यह बात विशेष तौर पर लागू होती है| हमारे पास एक गौरवशाली अतीत तो है, पर हमारे गाँव का वर्तमान बीमार है| मुझे गाँव से कोई “नॉस्टेलजिक” किस्म का लगाव नहीं है| पर अपने सामने गाँव को तिल तिल कर मरते देखना, भविष्य को बिखरते देखना बड़ा डरावना लगता है। खत्म होते स्कूल, अस्पताल, टूटी सड़कें लडभड़ोल हर गाँव की कहानी हैं। और इन सब से आँख चुराने के लिए हमारे पास है एक “अतीत”, गाँव के “पुराने अच्छे दिनों” की याद।

बिना भटके बात करूँ तो लडभड़ोल में ही शिक्षा के लिए सरकारी स्कूलों की यादें आपके जेहन में होंगी। हम गर्व भी कर सकते हैं कि हमारे पास उन दिनों में शानदार सरकारी स्कूल थे। पर आज आकर देखिये जनाब, यहाँ कई सरकारी स्कूल बन्द हो गए है तो कई बन्द होने की कगार में है।

इसमें एक और महत्तवपूर्ण भूमिका शिक्षा के माध्यम की भी है। अँग्रेजी शिक्षा हमें अपने परिवार से और समाज के दायित्वों से अलग करती है। आप कहेंगे कि आज अँग्रेजी के बिना कामयाबी संभव नहीं है तो मेरा ये कहना है कि चीन, जापान, रुस आदि देशों नें अपनी भाषा में ही कामयाबी हासिल की है। युवाओं को इस दिशा में आगे आने की और असलियत पहचानने की जरुरत है।

किसी भी समाज की रीढ़ उसकी संस्कृति होती है और इसका वजूद तब तक ही रहता हैै जब तक इसको बनाए रखने वाले मौजूद होते हैं। पलायन होते समाज से संस्कृति भी धीरे-धीरे नष्ट होने लगती है और अंततः इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर रह जाती है। यही वाकया लडभड़ोल के साथ होने जा रहा है। मेले, गीत, पहनावे, खान-पान, रीति-रिवाज आदि पलायन के साथ ही लुप्त हो रहे हैं। अगर अभी भी सरकार नहीं जाएगी तो इसके गंभीर परिणाम भी भुगतने पड़ सकते हैं।

आखिर में लौटना तो गाँव ही होगा क्योंकि अपनी भूमि अपनी ही होती है वो चाहे गांव की हो या फिर देश के किसी भी कोने की। वक्त रहते नहीं समझे तो बाद में पछतावे के इलावा हमारे पास कुछ नहीं रहेगा। क्योंकि हम जैसा बोएंगे, काटेंगे भी तो वो ही। सभी तो सरकारी नौकरी में नहीं लगेंगे, सभी विदेशों में बेहतरीन पदों पर नहीं पहुंचेंगे क्योंकि सबकी अपनी हदें हैं। उडऩा जरूरी है लेकिन अपने पंखों के हौंसलों को देखकर उड़ान भरने में ही भलाई है, किसी की देखा-देखी करके नहीं।

लडभड़ोल गांवों के ऊंचे तबके के लोग शहरों में आकर बस रहे हैं क्योंकि उनके पास पैसा है। वहीं उनकी देखा-देखी के चलते दूसरे लोग भी बाहर निकलने लगे हैं। आजकल सब एक-दूसरे की भागम-भाग में लगे हैं। अपनी मेहनत, अपनी प्रतिभा सही जगह इस्तेमाल करने की बजाए दूसरों की देखा-देखी में जो है उसे ही खत्म करने पर तूल दे रहे हैं। हमें संभलना होगा और समझना होगा कि हम जहां है वहां होना भी किसी फक्र से कम नहीं है। यह सोचने का विषय है और वो भी गंभीरता से।

गांव में रहने वालों को शहरों की चकाचौंध भरी जिंदगी भाने लगी है। देशी-विदेशी बनने में बड़प्पन महसूस करने लगे हैं लेकिन कोई यह नहीं समझ पा रहा है कि ये चकाचौंध, ये बड़प्पन चार दिन का है। भूमि बंजर होगी, सब इस तरह से एक स्थान से दूसरे स्थान तक भागते रहेंगे तो जिंदगी के मायने रह क्या जाएंगे? आने वाले कल के बच्चों का भविष्य क्या होगा? इसके लिए कौन जिम्मेवार है? हमारा प्रशासन, हमारी सरकार या खुद हम। इसके लिए तीनों ही जिम्मेवार है। हमें रूकना होगा क्योंकि सब अगर बाहर ही दौडऩे लगें तो घर खाली हो जाएंगे और मकान, मकान नहीं रहेंगे बल्कि खंडहर बन जाएंगे।

लडभड़ोल में भी अब रिश्तों की अहमियत खत्म होने लगी है। बेटे शादी और बच्चे होने पर अपने माता-पिता को बिना किसी सहारे के गाँव में छोङकर शहरों मेँ चले जाते हैँ। पीछे से उसके बूढे माँ-बाप जीवन रुपी सागर को अकेले पार करने के लिए मजबूर होते हैं।आखिर क्यों हो रहा है ऐसा?

इसका एक ही इलाज़ है लडभड़ोल का विकास, अगर लडभड़ोल का सही तरीके से विकास होगा तो कोई शहरों में नही जायेगा।आइये ना गाँव में! अतीत के भूत को भगाने। हमारा वर्तमान बदहाली का शिकार है। दुनिया भर में फैले आप सब लोग इस बदहाली के भंवर से अपने लडभड़ोल को निकाल सकते हैं। आइये बीते वक्त की याद से निकलकर वर्तमान की लड़ाई लड़ें। इसलिए आप सब युवाओं को अपने सपने पुरे करने के साथ-साथ अपने माता-पिता के सपनों को भी पूरे करने चाहिए लेकिन भारतीयता के साथ। अगर संस्कृति छोड़ोगे तो हमारा लडभड़ोल स्माप्त हो जाएगा।





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